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Sunday, 25 August 2013

छुटकारा ---

छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 

मै भी करना चाहती हूँ 
अब पीड़ा ,दर्द से कुट्टी 
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 




शिकारी पीछे पड़े है 
सामाजिक पारिवारिक दायित्वों 
 के नाम पर मै तो जा रही लुट्टी   
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 


न तो किस्मत ख़राब थी न नीयत 
फिर जिंदगी रही बस बंद मुठ्ठी 
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 


सेविका बन गयी गाली खाते खाते 
अब तो दर्द की लहर दबी हुई है उठ्ठी 
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 


सब कुछ तो है  हाथ पैर आंख कान 
फिर क्यूँ क्यूँ मानू  अपनी तकदीर फ़ुट्टी 
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 


गली के कुत्तो भेड़ों के नाम पर --जो पनाह दे रखी है 
इस एहसान की और नही पीनी है घुट्टी 
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 
************************इन्दू 

Thursday, 18 July 2013

DEVANAND

बेस्ट ऑफ़ देवानंद
http://www.youtube.com/watch?v=XE2-yBOJL1Q

बोझ

मै समाज पर बोझ न बन सकू यही कोशिश करते रहते है पर कभी कभी समाज भी बोझ बन जाता है इसलिए रुकना पड़ता है lकही आप समाज पर बोझ तो नहीं --------जब मैंने एक महिला को खुद को साहित्यकार कहते देखा और उनका कृत्य --सचमुच इस शब्द से भी घबराहट होने लगी -----------conti 

Monday, 15 July 2013

सम्मान

कोई किसी का अपमान करता है कोई सम्मान देता है --कही किसी का इतना सम्मान होता है कही किसी का रोज रोज अपमान होता है -----------------------------
अन्य कैसे दे सकता है -सम्मान
अन्य का किया अपमान स्वीकार नहीं
अपने प्रशंसक आप ही बने और आलोचक भी -क्यूंकि जब आप अपने होते है तो साड़ी दुनिया आपको देखना सीख सकती है 

Friday, 12 July 2013

इक दिन तो

मैं ये सोच कर हर गम का कपडा पहनती रही कि फट जाएंगा

कभी आंसुओ को न रोका सोचा चलो सैलाब कुछ घट जाएंगा

मेरे हिस्से में मेरे किस्से में जो समय लिखा है वो कट जाएगा

ये बादल बरस कर कभी तो जीवन के आसमा से हट जाएगा

दिल को जो भी गलत लगता है वो इक दिन तो छट जाएगा ----------

Thursday, 11 July 2013

साहित्यिक हड़ताल -अनशन

कभी आपने साहित्यकारों की हड़ताल सुनी है ,शायद न सुनी हो क्यूंकि कभी की ही नहीं --सोचिये एक साहित्यकार कहे कि मै बात न मानने के लिए अपनी साहित्य रचनाये नहीं लिखूंगा क्यूंकि समाज मेरे दर्द को समझ नहीं पा रहा है और अब मै समाज के पृष्ठों पर लिखूंगा 
 कुछ सैकड़ो साहित्यकार मिलकर कहे कि यदि समाचार पत्रों /पत्रिकाओं में बेहूदा भाषा ,विज्ञापन या अन्य सामजिक रूप से  आपत्ति जनक सामग्री छापी गयी तो वो लेखन नहीं करेंगे --एक धमकी के रूप में 
मेरी जानकारी में ऐसी कोई हड़ताल या अनशन नहीं आया है -
इसी प्रकार ----संगीत ,कला के क्षेत्र में 
कल सम्मानित की गयी संगीतज्ञ ऊषाश्रीवास्तव जी ने बताया कि वो ऐसा ही करती है अपने प्रतिष्ठान में -

Monday, 24 June 2013

विशुद्ध आस्था


मै व्यक्तिगत रूप से पाप्त बुद्धि विवेक और अनुभूतियो पर आधारित तर्कों की सहायता से -इतना ही कह  सकती हूँ कि -हिन्दू धर्म =सनातन धर्म =वैदिक धर्म =मूर्ति पूजा  करनेवालों का धर्म =पर्यावरण प्रेमी और एकनिष्ठ ईश साधना करने वाला आर्य समाज =जैन धर्म =सिख धर्म =पारसी धर्म -इन सभी को आत्मावलोकन की आवश्यकता है और तात्कालिक रूप से जिम्मेदारी लेने का सहस भी करना होगा अपनी आलोचना स्वयं करनी है इन्हें किसी के कहने  की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए ---क्यूंकि ये चिंतन मनन करना चाहे तो कर सकते है और सत्य निष्ठता को स्वीकार करते है लोक कल्याण का सूत्र इन्ही के पास है । समय के साथ चले आये पारंपरिक व्यापारिक पापो  को अपने से दूर कर विवेक  अग्नि में भस्म करे और विशुद्ध आस्था तत्व इस महा प्रलय में प्रवाहित-विसर्जित करे ------
जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  न हो 
जहाँ तर्क करने का अवसर ही न हो 
जहाँ किसी अन्य की स्वीकार्यता न हो 
वह भारत नहीं हो सकता 
वह भारतीयता नहीं हो सकती 
वह सनातन धर्म नहीं हो सकता 
मानसिक विकास और मानसिक पतन ---
ये एक पारिवेशिक संस्कारो पर आधारित है 
अपनी आलोचना स्वयं  कर सके -उसे ही सनातन धर्म कहा जाता है ,लोकतंत्र इसी को कहते है । जब दोष उत्पन्न हो चुके है तो उन्हें स्वीकारना -मात्र अपनी आलोचना  नहीं उससे भी अधिक है । आत्मोद्दार है वह -
यही तो सत्य को स्वीकारना है -और सत्य ही[ शिव] -कल्याणकारी  है -