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Tuesday, 1 October 2013

स्वस्थ चिंतन : अभिव्यक्ति के अधिकार के अभ्यास का सुअवसर

स्वस्थ चिंतन : अभिव्यक्ति के अधिकार के अभ्यास का सुअवसर: फेस  बुक हमारे आपके  लिए एक डायरी ही नहीं यहाँ केवल शेरो शायरी ही नहीं ट्विटर पर कोई चुटकी लेले भावनाओ से कोई खेले इससे बहुत ही अधिक है...

Sunday, 29 September 2013

आसक्ति से विरक्ति ही जीवन है

अगर रश्मि न होती तो सूर्य भी खुद में जल जाता शायद
प्रकशित जग हुआ और जीवन मिला दोनों की विरक्ति से
छोड़ कर पहुची इस लोक में अंधेरो से लड़ने वो क्यूँ आई
 प्रकृति का सन्देश देखो कैसे किरण आगे बढी आसक्ति से 

Sunday, 25 August 2013

छुटकारा ---

छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 

मै भी करना चाहती हूँ 
अब पीड़ा ,दर्द से कुट्टी 
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 




शिकारी पीछे पड़े है 
सामाजिक पारिवारिक दायित्वों 
 के नाम पर मै तो जा रही लुट्टी   
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 


न तो किस्मत ख़राब थी न नीयत 
फिर जिंदगी रही बस बंद मुठ्ठी 
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 


सेविका बन गयी गाली खाते खाते 
अब तो दर्द की लहर दबी हुई है उठ्ठी 
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 


सब कुछ तो है  हाथ पैर आंख कान 
फिर क्यूँ क्यूँ मानू  अपनी तकदीर फ़ुट्टी 
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 


गली के कुत्तो भेड़ों के नाम पर --जो पनाह दे रखी है 
इस एहसान की और नही पीनी है घुट्टी 
छुटकारा चाहिए छद्म से 
छटपटाहट से छुट्टी 
************************इन्दू 

Thursday, 18 July 2013

DEVANAND

बेस्ट ऑफ़ देवानंद
http://www.youtube.com/watch?v=XE2-yBOJL1Q

बोझ

मै समाज पर बोझ न बन सकू यही कोशिश करते रहते है पर कभी कभी समाज भी बोझ बन जाता है इसलिए रुकना पड़ता है lकही आप समाज पर बोझ तो नहीं --------जब मैंने एक महिला को खुद को साहित्यकार कहते देखा और उनका कृत्य --सचमुच इस शब्द से भी घबराहट होने लगी -----------conti 

Monday, 15 July 2013

सम्मान

कोई किसी का अपमान करता है कोई सम्मान देता है --कही किसी का इतना सम्मान होता है कही किसी का रोज रोज अपमान होता है -----------------------------
अन्य कैसे दे सकता है -सम्मान
अन्य का किया अपमान स्वीकार नहीं
अपने प्रशंसक आप ही बने और आलोचक भी -क्यूंकि जब आप अपने होते है तो साड़ी दुनिया आपको देखना सीख सकती है 

Friday, 12 July 2013

इक दिन तो

मैं ये सोच कर हर गम का कपडा पहनती रही कि फट जाएंगा

कभी आंसुओ को न रोका सोचा चलो सैलाब कुछ घट जाएंगा

मेरे हिस्से में मेरे किस्से में जो समय लिखा है वो कट जाएगा

ये बादल बरस कर कभी तो जीवन के आसमा से हट जाएगा

दिल को जो भी गलत लगता है वो इक दिन तो छट जाएगा ----------